बच्चे में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए ये काम जरूर करें

मैं एक मां हूं और आज आप लोगों के संग बच्चे की परवरिश को लेकर अपने अनुभव को आप सबके संग साझा करना चाहती हूं। जैसा कि हम लोगों को शुरू से सिखाया जाता है कि बच्चों को अपने से बड़ो की बात माननी चाहिए और हमेशा उनकी बातों को सुनना चाहिए। वहीं दूसरी तरफ क्या आप लोगों को भी ऐसा महसूस हो रहा है कि आजकल के बच्चे बहुत स्मार्ट हैं, कुछ भी पूछो तो उसके पास हर सवाल का जवाब मौजूद रहता है। गलत-सही सब सीखते हैं और व्यवहार में भी लाते हैं यही चीज़ें । अब मेरा सवाल ये है कि अगर हमारे बच्चे इतने स्मार्ट होकर भी गलत राह पर चले जाते हैं तो इसके पीछे कोई तो वजह जरूर होगी। अगर बच्चे किसी गलत राह पर जा रहे हैं तो जरा सोचकर देखिए क्या सिर्फ इसके लिए वही जिम्मेदार हैं? क्या इस तरह के हालात के लिए कहीं ना कहीं हम-आप और हमारी पारिवारिक स्थितियां इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं ?क्या बच्चे ही हमेशा गलत होते हैं और बड़ों की कोई गल्ती नहीं ?
नजरिया बदलने की है जरूरत / Need to change vision
- इस बात से परेशान मत होइए कि बच्चे आपकी बात नहीं सुनते बल्कि इस बात पर परेशान होइये कि आपके बच्चे हमेशा आपको ही देख रहे हैं, सुन रहे हैं और आपका अनुशरण कर रहे हैं।
- जब हमारे और आपके घर में किसी बात को लेकर विवाद होता है तब गुस्से की स्थिति में हम वो बात भी बोल जाते हैं जो हमें नहीं बोलना चाहिए। भले बाद में हमें इसको लेकर पश्चाताप होता है लेकिन हम ये भूल जाते हैं कि घर में बच्चा भी मौजूद है और ये सब देख सुनकर वो ना जाने क्या सोच रहा होगा।
- हम हमेशा ये मानकर चलते हैं कि अरे बच्चा तो अभी छोटा है लेकिन हमारी यही सोच तो गलत है। बच्चे जो भी देखते और सुनते हैं उसी को अपने व्यवहार में लाते हैं। और बच्चों को यही सब बातें गलत राह की ओर अग्रसर कर देते हैं। अब तो आप भी ये मान रहे होंगें की जाने अनजाने में हम लोग ही अपने बच्चे को गलत चीजों की ओर ले जाते हैं।
अब शर्मा फैमिली का ही किस्सा ले लीजिये बहु-बेटा नौकरी पर जाते हैं। तीन साल का बेटा है जो नर्सरी में पढ़ता है, सास-ससुर रिटायर्ड हैं ।अब एक दिन सासुमां ससुरजी से कह रही थीं कि ये मैडम तो पर्स लटका कर चल देती है और हम इनका घर और बच्चा संभाले । इसके बाद जब एक दिन परिवार के सभी सदस्य इकठ्ठा थे तब बच्चे ने अपनी मां से कह दिया तुम तो रोज़ पर्स लटकाकर चल देती हो।अब जाहिर है इसके बाद सबने उसे डांटा और बेचारा बच्चा रोने लगा और रोते ही समय उसने कहा ऐसा तो दादी बोलती हैं। कहने का मतलब ये कि क्यों नहीं हम अपनी भाषा पर संयम बरतें और बच्चे के सामने वैसी कोई बात भी नहीं बोलें जिनका उनके उपर गलत प्रभाव पड़ता हो।
अक्सर हम लोग घर में चिल्लाकर बोल देते हैं, हम ये भूल जाते हैं कि बच्चे अपने माता-पिता से ही सीखते हैं। एक दूसरा उदाहरण देना चाहूंंगी कि अगर आप खुद हमेशा मोबाइल टीवी और लैपटॉप से चिपके रहते हैं और इसके बाद बच्चे से कहेंगी कि तुम मोबाइल टीवी और लैपटॉप को छूओ भी नहीं तो क्या ये संभव है? इसके लिए तो सबसे पहले आपको खुद पर काबू पाना होगा। अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्चा फिटनेस के प्रति सजग रहे तो इसके लिए आपको अपने बच्चे के सामने खुद उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। आप खुद तो जंक फूड खाएंगी और बच्चे से उम्मीद करेंगी कि वो सलाद और फल का ज्यादा सेवन करें तो मेरे हिसाब से ये कतई मुमकिन नहीं। इसके लिए आपको खुद पहल करनी होगी और अपने बच्चे को अच्छा इंसान बनाने के लिए आपको खुद में बदलाव लाने की जरूरत है। ये सब मैं आप लोगों से इसलिए कह रही हूं क्योंकि मैंने अपने निजी जीवन में इस तरह के प्रयोग को किया है और मुझे इसके बाद से अपने बच्चे में सकारात्मक परिवर्तन नजर आ रहे हैं। अगर आपको मेरी बातें अच्छी लगी तो इसको अपने घर में जरूर अमल में लाएं और कमेंट के माध्यम से अपना सुझाव जरूर दें।
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